Monday, February 27, 2012

सिलसिलेवार गलतियों का नतीजा है कश्मीर समस्या’(यशवंत सिन्हा )

नई दिल्ली। पूर्व विदेश मंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने बुधवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर की समस्या भारत की सिलसिलेवार गलतियों का नतीजा है। जनवरी 1948 को भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र जाना सबसे बड़ी गलती थी। पाकिस्तान भारत के प्रति हमेशा से आक्रामक रहा है। भारत-पाकिस्तान वार्ता के दौरान इस्लामाबाद का मुख्य मुद्दा जम्मू-कश्मीर ही रहता है। आज पाकिस्तान भारत के खिलाफ खुलकर बोल रहा है और हम चुप बैठे हैं।
श्री सिन्हा ‘पीओके और जम्मू-कश्मीर उत्तरी सीमांत की वर्तमान स्थिति व भावी दिशा’ विषय पर आय़ोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इसका आयोजन ‘सेंटर फॉर सिक्योरिटी एन्ड स्ट्रेटेजी’ के तत्वावधान में किया गया था।

उन्होंने कहा कि आज पाक अधिगृहीत कश्मीर (पीओके) में पाकिस्तान द्वारा मानवाधिकारों का हनन किया जा रहा है। वहां के युवाओं में बेराजगारी को लेकर भी रोष व्याप्त है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण रूप से प्राप्त करने के लिए आज एक देशव्यापी आंदोलन करके लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है। भारत इस मुद्दे पर लम्बे समय से सभ्य तरीके से व्यवहार कर रहा है लेकिन अब समय आ गया है कि पीओके सहित गिलगित एवं बाल्टिस्तान को वापस पाने के लिए भारत इस मामले में कठोर कदम उठाए।

सम्मेलन में वाशिंगटन स्थित ‘इंस्टीट्यूट ऑफ गिलगित-बाल्टिस्तान स्टडीज’ के निदेशक सेंज सेरिंग ने कहा कि उत्तरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग पाकिस्तानी शासन से त्रस्त आ चुके हैं। वहां के लोगों पर पाकिस्तान द्वारा घोर अत्याचार किया जा रहा है।

सेरिंग ने कहा, “इस क्षेत्र में यूरेनियम समेत अन्य खनिजों का भंडार है लेकिन सरकार उसका उपयोग वहां के लोगों के आर्थिक हितों के लिए नहीं कर रही। स्थानीय निवासियों के लिए खनन पर प्रतिबंध है। जबकि सरकार ने खनन का हक चीन को दे रखा है और इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि चीन द्वारा यूरेनियम का प्रयोग कितना विनाशकारी होगा। भारत को इस क्षेत्र में अपना दखल बढ़ाना चाहिए और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को भी चीन पर पीछे हटने के लिए दबाव बनाना चाहिए।”

सेरिंग ने कहा कि बाल्टिस्तान में 1.4 मिलियन लोग दुखदायी परिस्थितियों में रह रहे हैं। उन्होंने भारत सरकार को धन्यवाद देते हुए कहा कि अंततः सरकार बाल्टिस्तान के लोगों की परवाह कर रही है।

कार्यक्रम को पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक पी.सी. डोगरा ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा, "जम्मू-कश्मीर के उत्तरी क्षेत्रों में चीन की उपस्थिति भारत के लिए खतरे की घंटी है। गिलगित-बाल्टिस्तान भारत के लिए रणनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है। आज वहां चीन ने कराकोरम हाई-वे का निर्माण कर लिया है और वहां वह अपनी सैन्य स्थिति मजबूत कर रहा है। जम्मू-कश्मीर के उत्तरी क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व स्थापित कर रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक वहां 7 हजार से 10 हजार तक चीनी सैनिक मौजूद है। चीन वहां सड़क निर्माण तो कर ही रहा है, इसके साथ ही उसने वहां 22 टनल भी बनाए हैं जहां ईरान से चीन तक गैस पाईपलाइन बिछाई गई है। चीनी सेना न केवल गिलगित बाल्टिस्तान, बल्कि पीओके में भी उपस्थित है।”

पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा कि गिलगित एवं बाल्टिस्तान में 15 हजार मेगावॉट जल विद्युत की क्षमता है और इसे बेचकर वहां की आर्थिक स्थिति में सुधार किया जा सकता है। इस क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों की काफी संभावनाएं हैं लेकिन पाकिस्तान ने उन सभी को चीन के हवाले सौंप दिया है। चीन आज इन संसाधनों का प्रयोग अपने लिए कर रहा है। आज जम्मू-कश्मीर के उत्तरी क्षेत्र में स्वास्थ्य, शिक्षा व रोजगार के लिए संभावनाएं नहीं है। नई दिल्ली को भारत-चीन सीमा विवाद में इस क्षेत्र को भी शामिल करना चाहिए।

कनाडा के इंटरनेशन सेंटर फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी के कार्यकारी निदेशक मुमताज खान ने कहा कि पीओके को पाकिस्तान की सेना द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है। 1974 एक्ट के तहत कश्मीर विधानसभा बनी और उसमें सभी नेता पाकिस्तान द्वारा भेजे गए। पाकिस्तान की सेना पीओके का प्रयोग भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियां चलाने के लिए कर रही है। वहां पाकिस्तानी सेना स्थानीय निवासियों पर कड़ी नजर रखती है। इस क्षेत्र में स्वास्थ्य, शिक्षा व अन्य सभी क्षेत्रों पर पाकिस्तानी सेना का आधिपत्य है और इन सभी क्षेत्रों की हालत जर्जर है। आज वहां के लोग अपनी स्वतंत्र पहचान चाहते हैं।

कार्यक्रम में प्रो. के.एन. पंडिता, राज्यसभा सांसद एवं द पॉयनियर से सम्पादक चन्दन मित्रा, कैप्टन आलोक बंसल, अजीत डोवाल, राणा बैनर्जी, वरिष्ठ पत्रकार विजय क्रांति, डॉ. नरेन्द्र सिंह, जी. पार्थसारथी सहित कई गण्यमान्य लोग उपस्थित थे।

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